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कश्मीर हिंसा पर काबू पाने के लिए पैलेट गन की जगह लेगी मिर्च से भरी PAVA शेल्स!

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कश्मीर में चल रही हिंसा में बड़े स्तर पर लोगों के चोटिल होने का कारण बनी पैलेट गनों का इस्तेमाल जल्द बंद किया जा सकता है। पैलेट गन की जगह अब मिर्च से भरी पावा शेल्स विकल्प के रूप में अपनाई जा सकती है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने क्षमतावान और नव-विकसित Сपावा गोलोंТ को इसके लिए उपयुक्त पाया है। मिर्च आधारित यह कम घातक हथियार निशाने को अस्थाई रूप से अक्षम बना देता है और वे कुछ मिनट के लिए जड़ हो जाते हैं।

СपावाТ का पूरा नाम Сपेलऑर्गेनिक एसिड वैनिलिल एमिदेТ है और इसे नोनिवामिदे के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऑर्गेनिक यौगिक है जो प्राकृतिक रूप से मिर्च में पाया जाता है। समिति ने इस सप्ताह के आरंभ में राष्ट्रीय राजधानी में इन गोलों का प्रदर्शन देखा और कश्मीर घाटी में प्रदर्शन जैसी स्थिति तथा भीड़ नियंत्रण के लिए सुरक्षा बलों को छर्रे वाली बंदूकों के स्थान पर इसके प्रयोग की हामी भर दी।छर्रे वाली बंदूकों के प्रयोग के कारण घाटी में कई लोग घायल हो गए हैं और अंधेपन के शिकार हो गए हैं, इसके कारण भारी आलोचना हो रही है। इस संबंध में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आज कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अगले कुछ दिन में पैलेट गनों का कोई विकल्प दिया जाएगा। 

जम्मू-कश्मीर की जनता तक पहुंचने के केंद्र सरकार के प्रयासों के तहत एक महीने के अंदर दूसरी बार राज्य के दौरे पर पहुंचे राजनाथ ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार Сइंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियतТ के दायरे में जम्मू कश्मीर में सामने आने वाली समस्याओं पर किसी से भी बात करने को तैयार है।उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ दिन में हम पैलेट गनों का विकल्प देंगे। पहले इन गनों को घातक नहीं समझा जाता था लेकिन कुछ घटनाएं हुईं। हमने एक महीने पहले एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी जिससे दो महीने में रिपोर्ट मिलने की संभावना थी लेकिन यह रिपोर्ट बहुत जल्द आएगी।

विशेषज्ञ कहते हैं कि कश्मीर में भीड़ और हिंसा को रोकने के लिये एक सेमी-लीथल वेपन की जरूरत है। इसके लिये पैलेट गन का इस्तेमाल किया जाता था।  जब ये गन प्रभावशाली साबित होने लगी, तो इन लोगों के समर्थकों ने प्रचार शुरू किया और पैलेट गन को हटाने के लिये शोर मचाना शुरू किया, ताकि सुरक्षाबल उनके हमलों का नहीं रोक पाएं। उन्होंने कहा कि मिर्ची पाउडर पहले भी इस्तेमाल किया जा चुका है, लेकिन वो इतना प्रभावशाली नहीं रहा है।मीडिया सूत्रों के मुताबिक लखनऊ स्थित Сवैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) की प्रयोगशाला भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में Сपावा गोलोंТ का परीक्षण एक वर्ष से ज्यादा समय से चल रहा है और इसका पूर्ण विकास बिलकुल सही समय पर हुआ है, जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। 

समिति के कामकाज से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पैनल ने छर्रे वाली बंदूकों के विकल्प के रूप में Сपावा गोलोंТ का पक्ष लिया है और सिफारिश की है कि ग्वालियर स्थित बीएसएफ के टियर स्मोक यूनिट (टीएसयू) को СतुरंतТ गोलों के उत्पादन का काम सौंप दिया जाए। पहली खेप में कम से कम 50,000 गोलों का उत्पादन किया जाए।


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